मिडिल ईस्ट इस समय अपने सबसे निर्णायक दौर से गुजर रहा है। दशकों से जिस शक्ति-संतुलन पर पूरा क्षेत्र टिका हुआ था, वह अचानक चरमरा गया है। ईरान पर अमेरिका और इजरायल के संयुक्त सैन्य अभियान ने न केवल तेहरान की राजनीतिक और सैन्य रीढ़ तोड़ दी, बल्कि उस पूरे रणनीतिक ढांचे को हिला दिया जिस पर मध्य-पूर्व की राजनीति आधारित थी। इस उथल-पुथल के केंद्र में अब एक नया नाम उभर कर सामने आ रहा है — तुर्की और उसके राष्ट्रपति रेसेप तैयब एर्दोगन।
ईरान का पतन और शक्ति-संतुलन का विस्फोट
ईरान पिछले चार दशकों से मिडिल ईस्ट में शिया प्रभाव का प्रमुख स्तंभ रहा है। लेबनान में हिज़्बुल्लाह, सीरिया में असद शासन, इराक में शिया मिलिशिया और यमन में हूती विद्रोही — यह पूरा नेटवर्क तेहरान की रणनीतिक गहराई का हिस्सा था।
लेकिन सीरिया में असद सरकार का गिरना, हिज़्बुल्लाह की सैन्य शक्ति में कमी होना, इराकी शिया गुटों का बिखरना और अब खुद ईरान की लीडरशिप का ध्वस्त होना — इन सबने मिलकर उस भू-राजनीतिक ढांचे को तोड़ दिया है। इस लिए मुझे लगता है कि इस शून्य को भरने के लिए अब सबसे सक्षम दावेदार के रूप में तुर्की उभर कर सामने आएगा।
एर्दोगन की चुपचाप रची गई रणनीति
एर्दोगन की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता है — विरोधी ध्रुवों के बीच संतुलन साधना। वह अमेरिका के भी करीबी हैं, रूस के भी, अरब देशों के भी और इस्लामिक दुनिया के नेताओं के भी। ईरान पर हमले के बाद उनकी प्रतिक्रिया न तो आक्रामक थी, न ही अवसरवादी। उन्होंने अमेरिकी कार्रवाई की आलोचना की, लेकिन ईरान के जवाबी हमलों को भी गलत ठहराया। यही संतुलित रुख उन्हें पूरे क्षेत्र में स्वीकार्य बनाता है।
मौजूदा हालात को देखते हुए यह कहना कतई गलत न होगा कि असल में एर्दोगन ने खुद को मिडिल ईस्ट का डिप्लोमैटिक ब्रिज बना लिया है — एक ऐसा सेतु, जो वाशिंगटन, मॉस्को, अरब राजधानियों और इस्लामिक संगठनों सभी से जुड़ा हुआ है।
सीरिया और इराक: तुर्की का नया शक्ति-केंद्र
सीरिया में तुर्की का प्रभाव अब निर्णायक हो चुका है। उत्तरी सीरिया में उसकी सैन्य मौजूदगी, प्रशासनिक नियंत्रण और स्थानीय गुटों पर पकड़ ने उसे वहाँ का वास्तविक पावर-ब्रोकर बना दिया है। इसी का असर इराक पर भी दिख रहा है। कुर्दिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी, सुन्नी अरब गुट और कई मिलिशिया संगठन अब तेहरान से हटकर अंकारा की ओर झुक रहे हैं। इराक और सीरिया मिलकर तुर्की के लिए एक ऐसा जियो-स्ट्रेटेजिक प्लेटफॉर्म बन रहे हैं, जिससे वह पूरे अरब क्षेत्र में अपना प्रभाव फैलाने में सक्षम हो रहा है।
रूस की कमजोरी और तुर्की का लाभ
यूक्रेन युद्ध में उलझा रूस पहले ही दबाव में है। सीरिया में उसकी सैन्य शक्ति कमजोर हो चुकी है। ईरान पर हमले ने रूस के क्षेत्रीय नेटवर्क को भी कमजोर कर दिया है। इस स्थिति में तुर्की धीरे-धीरे रूस के खाली किए गए रणनीतिक स्थानों में प्रवेश कर रहा है। एर्दोगन की खासियत यह है कि वह टकराव की बजाय कूटनीति से आगे बढ़ते हैं। रूस से सीधे टकराने के बजाय वह खुद को मध्यस्थ और साझेदार के रूप में पेश करते हैं, लेकिन असल में क्षेत्रीय समीकरणों को अपने पक्ष में मोड़ लेते हैं।
मध्य एशिया: नया तुर्किक ब्लॉक
ऑर्गनाइजेशन ऑफ तुर्किक स्टेट्स के जरिए तुर्की अब एक सांस्कृतिक रिश्ते को भू-राजनीतिक शक्ति में बदल चुका है। आप सभी जानते हैं कि कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान और अजरबैजान के साथ तुर्की का गठबंधन मध्य एशिया में एक नया शक्ति-ध्रुव बना रहा है। ईरान की कमजोरी से “मिडिल कॉरिडोर” का महत्व कई गुना बढ़ गया है — यह मार्ग चीन से यूरोप तक तुर्की के जरिए व्यापार का नया सुपरहाइवे बन सकता है। यह न केवल रूस और ईरान को बायपास करता है, बल्कि तुर्की को वैश्विक सप्लाई चेन का केंद्रीय केंद्र बना सकता है।
अफ्रीका: एर्दोगन की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक छलांग
अफ्रीका में तुर्की का विस्तार पिछले दशक की सबसे अनदेखी लेकिन सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक सफलता है। जिस पर भारत की नज़र अभी तक धारदार नहीं है या ये कहिए कि हमारा देश कहीं कोई चूक कर रहा है अपने डिप्लोमेटिक मिशन में अफ्रीका में विस्तार करते हुए जिसका भविष्य में हमें काफी नुकसान होने की सम्भावना हैं वहीं दूसरी तरफ तुर्की ने यहाँ केवल व्यापार ही नहीं किया, बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर, रक्षा सहयोग, सैन्य प्रशिक्षण और हथियार निर्यात के जरिए अपना स्थायी प्रभाव बनाया है।
हॉर्न ऑफ अफ्रीका, साहेल क्षेत्र और उत्तरी अफ्रीका में तुर्की के ड्रोन, हथियार और सैन्य सलाहकार पहले से ही मौजूद हैं और भारत अभी भी कोशिशें ही कर रहा है। अब ईरान के कमजोर होने से अफ्रीका में उसका दशकों पुराना नेटवर्क बिखर रहा है, और तुर्की इस खाली जगह को बेहद तेजी से भर रहा है।
अब यहाँ एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि क्या एर्दोगन नया खलीफा बनने की ओर बढ़ रहे हैं? आप सभी को यह सवाल प्रतीकात्मक जरूर लग रहा होगा, लेकिन इसके पीछे एक बेहद ठोस रणनीति छिपी है। हक़ीक़त में एर्दोगन अब केवल तुर्की के राष्ट्रपति नहीं रहना चाहते। वह खुद को इस्लामिक दुनिया के नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं — एक ऐसा नेता, जो राजनीतिक, सैन्य, आर्थिक और वैचारिक — चारों मोर्चों पर प्रभाव रखे। उनकी नीति नव-उस्मानी (Neo-Ottoman) सोच से प्रेरित दिखाई देती है, जिसमें तुर्की को फिर से एक महाशक्ति के रूप में खड़ा करना लक्ष्य है।
अंत में मैं इतना ही कहूँगी कि भविष्य में मिडिल ईस्ट की सत्ता का नया केंद्र अंकारा बनता नजर आ रहा है। क्योंकि ईरान का पतन, रूस की व्यस्तता, अमेरिका की सीमित हस्तक्षेप नीति और अरब दुनिया की बिखरी हुई राजनीति — ये सभी मिलकर तुर्की के लिए ऐतिहासिक अवसर पैदा कर सकते हैं और एर्दोगन इस मौके को केवल भुना नहीं रहे, बल्कि एक नई विश्व-व्यवस्था की नींव रख रहे हैं — जहाँ अंकारा सिर्फ एक राजधानी नहीं, बल्कि सत्ता का नया वैश्विक केंद्र बन सकता है।
हालांकि आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि एर्दोगन केवल एक शक्तिशाली क्षेत्रीय नेता बनते हैं या सचमुच अरब से अफ्रीका तक फैले एक नए जियोपॉलिटिकल साम्राज्य के शिल्पकार। मुझे लगता है यहाँ सवाल अब केवल क्षेत्रीय वर्चस्व का नहीं रहा, बल्कि एक नए इस्लामिक पावर सेंटर के उदय का बन चुका है।
कॉपीराइट मनु चौधरी


